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E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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हठयोग प्रदीपिका एवं शिव संहिता में कुण्डलिनी साधना और राजयोग की प्राप्ति

Author(s) Manish Kumar
Country India
Abstract भारतीय योग परम्परा में कुण्डलिनी साधना को आध्यात्मिक उत्कर्ष की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साधना माना गया है। हठयोग के प्रमुख ग्रन्थ हठयोग प्रदीपिका तथा शिव संहिता इस साधना का विस्तृत एवं व्यवस्थित निरूपण प्रस्तुत करते हैं। दोनों ग्रन्थों में कुण्डलिनी को मानव-शरीर में स्थित सुप्त आध्यात्मिक शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है, जिसके जागरण से सुषुम्ना नाड़ी सक्रिय होती है तथा साधक क्रमशः चित्त-स्थैर्य, मनोलय, समाधि एवं राजयोग की अवस्था का अनुभव करता है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य हठयोग प्रदीपिका एवं शिव संहिता में प्रतिपादित कुण्डलिनी साधना के स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, साधनात्मक प्रक्रिया तथा राजयोग की प्राप्ति में उसकी भूमिका का विश्लेषण करना है। अध्ययन में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि दोनों ग्रन्थ कुण्डलिनी को केवल रहस्यवादी अथवा तान्त्रिक अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि योग-साधना की केन्द्रीय शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। यद्यपि दोनों ग्रन्थों की प्रस्तुति-पद्धति में कुछ भिन्नताएँ हैं, तथापि उनका मूल प्रतिपाद्य समान है कि प्राण के सुषुम्ना मार्ग में प्रवाहित होने तथा कुण्डलिनी के जागरण के बिना राजयोग की सिद्धि सम्भव नहीं है। शोध में तुलनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति का उपयोग किया गया है। प्राथमिक स्रोत के रूप में हठयोग प्रदीपिका तथा शिव संहिता के मूल संस्कृत पाठ का अध्ययन किया गया है। दोनों ग्रन्थों में वर्णित आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा, नाड़ी-शोधन तथा शक्तिचालन की प्रक्रियाओं का समन्वित अध्ययन करते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि कुण्डलिनी साधना वस्तुतः शरीर, प्राण एवं चित्त के क्रमिक परिष्कार की वैज्ञानिक साधना है, जिसका परम लक्ष्य राजयोग एवं समाधि की प्राप्ति है। इस अध्ययन से यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि कुण्डलिनी जागरण हठयोग की सम्पूर्ण साधना का केन्द्रबिन्दु है तथा राजयोग उसकी स्वाभाविक परिणति है। दोनों ग्रन्थ साधना की बाह्य विधियों की अपेक्षा अन्तःकरण की शुद्धि, गुरु-परम्परा, नियमित अभ्यास तथा प्राण-नियन्त्रण को अधिक महत्त्व प्रदान करते हैं। इस प्रकार कुण्डलिनी साधना को आध्यात्मिक चेतना के क्रमिक उत्कर्ष की वैज्ञानिक एवं अनुशासित प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है।
Keywords कुण्डलिनी, हठयोग, राजयोग, सुषुम्ना, प्राणायाम, शक्तिचालन, समाधि, शिव संहिता, हठयोग प्रदीपिका।
Published In Volume 8, Issue 5, September-October 2026
Published On 2026-09-11

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