International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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गृह्यसूत्रों में वर्णित विवाह संस्कार

Author(s) Ms. Akanksha Nigam
Country India
Abstract प्राचीन काल से ही मानव जीवन में संस्कारों की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मनुष्य के व्यक्तित्व एवं चारित्रिक विकास में संस्कारों का प्रथम स्थान रहा है। सामाजिक जीवन को सफल, सुसंगठित एवं अनुशासित बनाने के लिए वर्ण और आश्रम के साथ-साथ संस्कारों की भी व्यवस्था है। मनुष्य की अभिवृद्धि में संस्कारों का अत्यन्त ही महत्वपूर्ण एवं लाभकारी योगदान रहा है। इन संस्कारों से संस्कारवान मनुष्य सुख- समृद्धि एवं आरोग्य की कामना करते हैं। श्रुति और स्मृतियों में कथित जिन कर्मों से मनुष्य को संस्कृत अथवा परिष्कृत किया जाता है, वे संस्कार कहलाते हैं।
प्राचीन भारतीय सामाजिक जीवन में विवाह का महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसके माध्यम से व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। प्राचीन भारतीय मान्यताओं के अनुसार, तत्कालीन समाज में विवाह की संकल्पना एवं आवश्यकता की अनुभूति की गई, जिसके माध्यम से कुटुम्ब में स्थायित्व स्थापित हो सका है तथा विवाह के पश्चात् दम्पत्ति न केवल गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगे अपितु स्वस्थ सामाजिक परम्परा का निर्वाह करने लगे और अपना योगदान भी देने लगे।
Keywords भारतीय संस्कृति, भारतीय सामाजिक जीवन, षोडश संस्कार, विवाह संस्कार, पाणिग्रहण, सप्तपदी, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र
Published In Volume 8, Issue 5, September-October 2026
Published On 2026-09-26

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