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E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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जगदीश पंकज के नवगीतों में आम आदमी का संघर्ष और अस्तित्व-बोध

Author(s) शिव राज, डॉ. रामवतार मेघवाल
Country India
Abstract समकालीन हिंदी नवगीत ने गीत को आत्मगत प्रणय और कल्पना-लोक से निकालकर जीवन के कठोर यथार्थ से जोड़ा है। इस धारा में जगदीश पंकज का स्थान विशिष्ट है, क्योंकि उनके नवगीतों का केंद्रीय पात्र वह आम आदमी है जो श्रम करता है, अभाव झेलता है, व्यवस्था के वायदों से छला जाता है और अपनी पहचान के लिए निरंतर संघर्षरत रहता है। प्रस्तुत शोध-आलेख में कवि के तेरह संग्रहों को, जिनमें 'सुनो मुझे भी' (2015) से आरम्भ होकर 'वर्तमान टूटे कंधों पर' (2024) तथा बाद की उपलब्ध कृतियाँ भी सम्मिलित हैं, प्राथमिक स्रोत मानकर आम आदमी के संघर्ष के चार आयामों का विश्लेषण किया गया है: श्रम और अभाव, बाज़ार और वस्तुकरण, सत्ता और व्यवस्था, तथा जाति और लिंग पर आधारित हाशियाकरण। साथ ही यह देखा गया है कि यह संघर्ष किस प्रकार अस्तित्व-बोध में रूपांतरित होता है, जहाँ व्यक्ति अपने होने, सुने जाने और अपने नाम की रक्षा का प्रश्न उठाता है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि पंकज के नवगीतों में अस्तित्व-बोध निराशा या पलायन में नहीं, बल्कि 'साक्षी-भाव' और सामूहिक प्रतिरोध में परिणत होता है।
Keywords नवगीत, जगदीश पंकज, आम आदमी, संघर्ष, अस्तित्व-बोध, हाशियाकरण, प्रतिरोध, समकालीन हिंदी कविता
Published In Volume 8, Issue 5, September-October 2026
Published On 2026-09-30
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i05.88782

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