International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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सतीश विमल के काव्य-संग्रह ‘विनाश का विजेता’ में अस्तित्व और आत्म-विसर्जन

Author(s) Mr. Arjun Singh
Country India
Abstract आज की हिंदी कविता केवल बाहरी घटनाओं का वर्णन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मनुष्य के भीतरी अकेलेपन, संघर्ष और जीवन की सच्चाई को गहराई से समझने की कोशिश करती है। सतीश विमल का काव्य-संग्रह ‘विनाश का विजेता’ इसी सोच का एक बहुत सुंदर और सच्चा उदाहरण है। इस संग्रह का नाम ही बताता है कि कठिन से कठिन समय और संकटों के बीच भी मनुष्य हार नहीं मानता, बल्कि अपने आत्मसम्मान और जीने की इच्छा को बचाए रखता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में इस संग्रह की मुख्य कविताओं और ग़ज़लों के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि कवि किस तरह मुश्किल हालात, अहंकार और सामाजिक दबावों का सामना करते हुए एक सच्चे और सादगीपूर्ण जीवन की खोज करता है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कवि के लिए ‘बाढ़’ और ‘आग’ केवल नुकसान पहुँचाने वाली चीजें नहीं हैं, बल्कि वे मन के झूठे घमंड और पुरानी कमजोरियों को धोकर साफ़ करने का माध्यम हैं। इसी तरह, कश्मीर की कड़ाके की ‘सर्दियाँ’ और ‘बर्फ़’ मनुष्य को यह सिखाती हैं कि संकट के समय धैर्य रखना कितना जरूरी है। यह शोध-पत्र यह सिद्ध करता है कि सतीश विमल की कविता निराशा में डूबने के बजाय मनुष्य को अपने अहंकार को छोड़कर एक मजबूत और सच्चे इंसान के रूप में जीने का अटूट हौसला देती है।
Keywords विनाश का विजेता, अस्तित्व, आत्म-विसर्जन, जीने की चाह, सर्दियों की सीख, स्वाभिमान, समकालीन हिंदी कविता।
Field Arts
Published In Volume 8, Issue 5, September-October 2026
Published On 2026-10-05
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i05.89072

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