International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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पालि बौद्ध साहित्य और आयुर्वेद में स्वप्न-विचार एवं शकुन-परंपरा

Author(s) Dr. Nigam Bhardwaj
Country India
Abstract स्वप्न और शकुन मानव जीवन के ऐसे अनुभव हैं, जिनका प्राचीन भारतीय साहित्य, दर्शन, चिकित्सा और धार्मिक परंपराओं में विशेष स्थान रहा है। मनुष्य निद्रा की अवस्था में अनेक प्रकार के दृश्य, घटनाएँ, अनुभूतियाँ और विचार अनुभव करता है। जाग्रत अवस्था में इन अनुभवों को समझने का प्रयास करते हुए प्राचीन समाज ने स्वप्नों को कभी मन की गतिविधि, कभी पूर्व अनुभवों की पुनरावृत्ति, कभी शारीरिक अवस्था का संकेत और कभी भविष्य की संभावित घटनाओं से संबंधित निमित्त के रूप में देखा। इसी प्रकार शकुन का संबंध किसी वस्तु को देखने, किसी ध्वनि को सुनने अथवा किसी वस्तु का स्पर्श करने से उत्पन्न शुभ-अशुभ धारणाओं से रहा है। प्रस्तुत शोध-पत्र में पालि साहित्य और आयुर्वेदिक संहिताओं के विशेष संदर्भ में स्वप्न एवं शकुन की अवधारणाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। मिलिन्दपञ्ह में स्वप्न की परिभाषा, स्वप्न देखने वाले व्यक्ति की मानसिक अवस्था, निद्रा के विभिन्न चरणों और स्वप्नफल की व्याख्या पर विचार किया गया है। चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता में स्वप्नों के वर्गीकरण, दोषों, निद्रा और रोग-पूर्वानुमान से संबंधित विचारों का विवेचन किया गया है। महा-सुपिन जातक में वर्णित सोलह स्वप्नों के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक समस्याओं की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति का अध्ययन किया गया है। इसके अतिरिक्त महामंगल जातक तथा बौद्ध मंगल-संबंधी साहित्य में दृश्य, श्रवण और स्पर्श-आधारित शकुनों तथा नैतिक आचरण के महत्त्व पर विचार किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि स्वप्न और शकुन की अवधारणाएँ केवल व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उनके माध्यम से मनुष्य, समाज, शासन, स्वास्थ्य और नैतिक जीवन पर चिंतन किया जाता था। यह अध्ययन प्राचीन भारतीय बौद्धिक परंपरा में मानसिक अनुभव तथा सामाजिक-सांस्कृतिक विश्वासों के संबंध को समझने में सहायक है।
Keywords स्वप्न, शकुन, पालि साहित्य, बौद्ध अध्ययन, आयुर्वेद, मिलिन्दपञ्ह, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, महा-सुपिन जातक, मंगल।
Field Arts
Published In Volume 8, Issue 5, September-October 2026
Published On 2026-10-22
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i05.90315

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